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दुर्बल दिल्ली


शिक्षा के क्षेत्र में दिल्ली के मुख्यमन्त्री अरविन्द केजरीवाल ने अपनी सहभागिता को लेकर जो दावे किए हैं,उन दावों की सच्चाई इस रिपोर्ट कार्ड से कितनी मेल खाती है,इसे आप स्वयं देख सकते हैं |

दिल्ली शिक्षा प्रणाली
रिपोर्ट कार्ड

by ASHISH SOOD, General Secretary, Delhi BJP

इन दिनों राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली के लोग बहुत ही चुनौतीपूर्ण परिस्थितियों से गुज़र रहे हैं | वे आज अपने द्वारा बनाई गई दिल्ली सरकार की विषम परिस्थितियों से भी जूझ रहे हैं क्योंकि हर एक सरकार अपने-अपने समय में अपना अलग-अलग राजनीतिक राग अलापती रहती है |

एक समय वह भी था जब एनडीए की सरकार में आदरणीय अटल बिहारी वाजपेयी जी द्वारा सबसे प्रतिष्ठित खेल सीडब्लूजी राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को एक वैश्विक शहर बनाने के मजबूत इरादों से सौंपा गया था | तब दिल्ली शहर में कांग्रेस की सरकार ने राष्ट्रमंडल खेलों के बुनियादी ढांचे के नाम पर हजारों करोड़ के भ्रटाचार का खेल खेला था | अटल बिहारी वाजपेयी जी की दृष्टि में यह एक बहुत ही निन्दनीय कार्य रहा है |


पहले तो दिल्ली की जनता कांग्रेस पार्टी के द्वारा ठगी गई | बेचारे मतदाताओं को यह अंदाज़ा भी नहीं था कि वे दिल्ली में कैसी सरकार चुन रहे हैं | कांग्रेस दिल्ली को सरकारी योजना के प्रभावी क्रियान्वयन और साफ़ सुथरी शासन व्यवस्था से दूर ले गई | दिल्ली की जनता ने कांग्रेस के बाद नौसिखिया आम आदमी पार्टी को अभूतपूर्व जनादेश के साथ दिल्ली की राजगद्दी सौंपी | आम आदमी पार्टी ने दिल्ली की जनता के द्वारा प्राप्त अभूतपूर्व जनादेश का कितना सम्मान किया यह तो उनके द्वारा दिल्ली की जनता के साथ किए गए क्रूर मजाक से ही साबित होता है | 



लोकतान्त्रिक मूल्यों का सबसे बड़ा पक्षधर होने के बावजूद आम आदमी पार्टी सबसे बड़ी अलोकतान्त्रिक कामकाज करने वाली पार्टी बनकर रह गई है | इन्होंने आपने फ़ायदे के लिए जनता के पैसों का कितना ग़लत फायदा उठाया है इसे तो हम आए दिन मीडिया रिपोर्टों के माध्यम से भली-भांति परिचित होते रहते हैं |



ऐसे में जब मीडिया के पास विधानमंडल की कार्यवाही पर कोई आलोचनात्मक समीक्षा की अनुमति नहीं है,तब भी आम आदमी पार्टी अपना लोकतान्त्रिक चेहरा जनता को इस तरह दिखा रही है कि अब यह ज़रूरी हो गया है कि कोई राजनीतिक दल अथवा गैर सरकारी संस्था समाज के उत्थान के लिए सरकार की असली तस्वीर को लेकर सामने आए |


इस रिपोर्ट में जहां अब दिल्ली सरकार के काम-काज का कोई वास्तविक स्वरूप दिखाई नहीं दे रहा है हम दिल्ली सरकार के उन महत्वपूर्ण विवादों को सामने लेकर आए हैं जिनसे दिल्ली की जनता त्रस्त है | यह वैसे मुद्दे हैं जिन पर शायद दिल्ली की जनता का ध्यान तो नहीं गया परन्तु मीडिया में इन्हें बड़ी बारीकी से उभारा गया जिसके लिए मैं मीडिया के उन रिपोर्टरों का शुक्रगुजार हूं जिन्होंने इन मुद्दों को बड़ी गम्भीरता से उठाया है | हम तीन सेक्टरों पर केन्दित हैं | यह तीनों रोज़मर्रा की ज़िन्दगी में हमें सबसे ज़्यादा प्रवाभित करते हैं और वे हैं- शिक्षा, स्वास्थ्य और यातायात | 


अरविन्द केजरीवाल और उनके विश्वसनीय सहयोगी मनीष सिसोदिया और सतेन्द्र जैन ने सभी विभागों को बूचड़खाना बनाकर रख दिया है | ये लोग अपने-अपने विभागों में आम आदमी पार्टी के स्वंयसेवकों के खजाने भरने के लिए तैनाती चाहते हैं और अपने पद का दुरुपयोग भी कर रहे हैं | 

मुझे यकीन है कि दिल्ली के लेफ्टिनेंन्ट गवर्नर नजीब जंग आप के मंत्रियों को पद के दुरुपयोग मामले में शुंगलू कमेटी की रिपोर्ट को जनता के सामने लाएंगे जिससे आम आदमी पार्टी के मंत्रियों पर जो सवाल खड़े हो रहे हैं उसका भी सबूत मिल जाएगा | 


यह रिपोर्ट तो महज सरकार के कार्यों की शुरूआती जांच भर है | लोकतन्त्र में प्रत्येक नागरिक को सरकार की नीतियों का पता होना चाहिए | सरकार के कामकाज की रिपोर्ट मीडिया रिपोर्टों के द्वारा जनता तक पहुंचना चाहिए जिससे जनता आसानी से तय कर पाएगी कि कौन- सा राजनीतिक दल भ्रष्ट है और कौन-सा दल जनता के हित में है | मुझे यकीन है मीडिया की इन रिपोर्टों से भ्रष्ट दलों का चेहरा बेनकाब हो जाएगा |

दिल्ली में स्कूल शिक्षा

सरकारी स्कूलों में नाममात्र शिक्षा

आप सरकार द्वारा शिक्षा का स्तर सुधारने के लिये अपने स्कूलों में पेरेंट टीचर मीटिंग आयोजित करना महज छलावा है क्योंकि राजधानी में शिक्षा में पूरी तरह पुनरुद्धार किये जाने की सख्त जरूरत है। पीटीएम आयोजित करने से केवल सरकार इस बात के संकेत का पता लगा सकती है कि शिक्षा प्रणाली में क्या कमी है लेकिन आज जरूरत इस बात की है कि अत्यंत प्रतिस्पर्द्धी बाजार में मुकाबले के लिये विद्यार्थियों को तैयार करने हेतु प्राथमिकता पर योग्य शिक्षकों की भर्ती सुनिश्चित की जाये। इसके अलावा सरकार को स्कूलों में बुनियादी ढ़ांचे में सुधार पर भी गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।


पिछले दो दशकों में राजनेताओं के भरोसे छोड़ कर शिक्षा क्षेत्र को बर्बाद होने दिया गया जबकि राजनेताओं ने जानबूझ कर शिक्षा प्रणाली को खराब होने दिया ताकि निजी स्कूलों के निहित स्वार्थ पूरे होते रहें। दिल्ली के बारे में ऐसी स्थिति स्पष्ट है, राजधानी में फरवरी 2015 में आप सरकार को चरमराई हालात में शिक्षा प्रणाली विरासत में मिली। उस समय क्लास रूम और शिक्षकों की काफी कमी थी और उनकी भर्ती लगभग दस साल में नहीं की गया थी। ऐसा भी पता चला था कि कुछ शिक्षकों ने एक भी क्लास नहीं ली थी। कांग्रेस दिल्ली में अपने शासन काल में शिक्षा प्रणाली की हो रही बदहाली पर मूक दर्शक बनी रही ।


दिल्ली सरकार के आंकड़ों से पता चलता है कि कक्षा 10 के पास प्रतिशत में लगातार गिरावट आती रही। दरअसल चिंता का विषय यह है कि फेल होने की दर अब 50 प्रतिशत तक पहुंचने वाली है। 2013-14 में 209533 विद्यार्थियों ने कक्षा 10 की परीक्षा दी थी उनमें से केवल 117265 पास हुये। इसी तरह 2014-15 में कक्षा दस की परीक्षा में 246749 बच्चों ने परीक्षा दी और केवल 127677 उत्तीर्ण हुये, पास प्रतिशत मात्र 51.74 बनती है। 


2015-16 में कुल 269703 बच्चों में से 136962 परीक्षा में पास हुये। असफलता का प्रतिशत बढ़ कर 49.22 पहुंच गयी। 


● पीटीएम महज छलावा, आम आदमी पार्टी- आप समर्थकों का जमावड़ा

● रीडिंग मेला लगाने से पहले पाठ्य पुस्तकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाये

● शिक्षा के लिये आबंटित अधिकांश राशि पीटीएम और रीडिंग मेलों जैसे हथकंडों पर खर्च


स्कूलों में दी जाने वाली सुविधाओं की सूची बहुत लंबी है मगर वास्तविकता आंखें खोलने वाली है। जमीनी हकीकत यह है कि दिल्ली में अधिकांश सरकारी स्कूलों में मूलभूत सुविधाओं का अभाव है। अरविंद केजरीवाल सरकार ने पिछले बजट में शिक्षा के लिये 10690 करोड़ रु आबंटित किया जोकि कुल आबंटन का 23 प्रतिशत था। कई सरकारी स्कूलों में खचाखच क्लास रूम, टूटे डेस्क, रिसतीं छतें, बदुबू वाले शौचालय, तथा पुस्तकालय और स्वच्छ पेय जल नहीं होने से पता चलता है कि दिल्ली में शिक्षा में सुधार का लक्ष्य हासिल करना आसान नहीं है।  


दिल्ली के विभिन्न इलाकों के पांच स्कूलों में जाने से मालूम हुआ कि उनमें मूलभूत सुविधायें ही नहीं है। इन स्कूलों में एक जैसे हालात थे जैसे कि खिड़कियों के टूटे शीशे, दीवारों से गिरता प्लास्टर, रिसती छतें और डेस्क नहीं होना। उत्तर पूर्व दिल्ली के सोनिया विहार स्कूल में बरामदों और गलियारों में कक्षा लगती हैं। लगभग 20 गुना 20 फुट क्लास रूम में 150 से अधिक छात्र बैठते हैं। कुछ स्कूलों में तो एक क्लास रूम में दो दो कक्षाऐं एक साथ लगती हैं। कुछ पंखें टूटे थे तो कुछ चलते नहीं थे। दिल्ली सरकार के शिक्षा निदेशालय के आंकड़ों से पता चलता है कि सरकार के कुल 1011 स्कूलों में से 47 में तीन तीन हजार से अधिक बच्चे पढ़ते हैं। दक्षिण दिल्ली में मोल़ड़बंद के चार स्कूलों में डेस्क और कुर्सियां नहीं हैं। अलीपुर के स्कूल में तो न बिजली थी न ही पानी। 


स्कूल के प्रधानाचार्यों ने कहा कि जरूरी मरम्मत कराने और नयी सामग्री उपलब्ध करने के अनुरोध पर मंजूरी में लंबा समय लगता है। उत्तर पूर्व में एक सर्वोदय स्कूल के प्रिसिपल निर्मल यादव, बदला हुआ नाम, ने बताया ---स्कूल में बिजली का मीटर लगवाने में दो साल लगे।

आप सरकार का दावा है कि पीटीए बैठक से शिक्षा का स्तर सुधरेगा। यह अच्छा कदम है लेकिन सरकार को स्कूलों में पहले बुनियादी ढांचा और मलभूत सुविधायें प्रदान करनी चाहियें। एससीआरटी की पाठ्य पुस्तकें समय पर मिलनी चाहियें। इस के बाद उन्हें पढ़ाने के लिये अनुभवी और प्रशिक्षित शिक्षक भर्ती करने चाहियें। उन्होंने कहा- इसके बाद ही पीटीएम और रीडिंग मेले जैसे हथकंडे अपनाये जा सकते हैं।

वेस्ट पटेल नगर के सर्वोदय बाल विद्यालय के एक शिक्षक ने यह साबित करने के लिये कुछ कागज दिखाये कि खिड़कियों के शीशे लगवाने और कुर्सियों तथा डेस्क मरम्मत कराने के उनके अनुरोधों पर दो साल से कुछ नहीं किया गया। सरकारी रिकार्ड के अनुसार विभिन्न स्कूलों में मरम्मत और रखरखाव के 1000 अनुरोध पर अभी कुछ नहीं किया गया। स्कूल प्रत्येक बुनियादी काम के लिये शिक्षा विभाग को लिखते हैं जो उसे लोक निर्माण विभाग को भेज देता है। अधिकारियों ने माना कि स्कूलों में खराब बुनियादी ढांचा होने की बात मानते हुये मरम्मत और सुधार का काम शुरू किया गया है। उन्होंने बताया कि स्कूलों में बच्चों की अधिक संख्या की समस्या के समाधान के लिये 8000 नये क्लास रूम और 21 नये स्कूल बनाये जा रहे हैं। सरकार लेकिन क्लास रूम के निर्माण के लिये खेल मैदान का स्थान कम कर रही है। 


स्कूलों में नतीजे असंतोषजनक हैं। दिल्ली में सरकार द्वारा चलाये जा रहे 122 स्कूलों में शिक्षा का स्तर खराब है लेकिन कक्षा 10,11 और 12 में पूछे जा रहे सवाल बहुत कठिन होते हैं। शिक्षकों का बड़ी संख्या में हाजिर नहीं रहना एक अन्य प्रमुख मुद्दा है। केवल 70 प्रतिशत शिक्षक केवल स्कूल में हाजिरी लगाने आते हैं। इनमें से अधिकांश टीचर रूम में गपशप करते हैं। यह सब एक रिटायर्ड स्कूल शिक्षक की सरकारी स्कूलों की रिपोर्ट में कहा गया है। इसके अलावा नये तैनात गैस्ट टीचर वटसअप और इंटरनेट पर अपना सारा समय बिताते हैं। पेरेंट टीचर मीटिंग में आम आदमी पार्टी से जुड़े लोगों का दबदबा रहता है। स्कूलों में नये लगाये गये आरओ काम नहीं कर रहे। आप सरकार पी टी ए में सदस्य बना कर स्कूलों के प्रबंध पर नियंत्रण करने और उन्हें पक्के वोटर कार्ड दिलवाने के लिये जरूरत से ज्यादा काम कर रही है।

आप सरकार क्योंकि पारदर्शिता सुनिश्चित करने में नाकाम रही है तो ऐसे में प्रत्येक नागरिक का यह अधिकार बनता है कि वह सरकार से सभी फैसलों और नीतियों को वेबसाइट पर अपलोड करने का अनुरोध करे ताकि वह इन्हें टिकाऊ सुधार में शामिल करने के लिये फैसलों और नीतियों की समीक्षा कर सकें तथा सरकार उनके साथ परामर्श कर सके।


आम आदमा पार्टी ने दिल्लीवासियों से सरकारी स्कूलों को बेहतर बनाने, निजी स्कूलों पर लगाम लगाने और उच्च शिक्षा के अवसर बढ़ाने समेत कई वायदे किये थे। आप सरकार दावा करती है कि वह एक स्वस्थ शिक्षा प्रणाली बनाने के प्रयास कर रही है जिसकी कांग्रेस अपने 15 साल कार्यकाल में निहित स्वार्थों को पूरा करने के लिये अनदेखी करती रही।

कुछ वर्ष पहले रिकार्ड संख्या में नौजवान छात्र परीक्षा में फेल होने पर आत्म हत्या किया करते थे जोकि अत्यंत चिंता का विषय था। तत्कालीन सरकार ने तभी से आठवीं कक्षा तक विद्यार्थियों को अगली कक्षा में तरक्की देने का काम किया भले ही उन्हें कुछ भी पढ़ना लिखना नहीं या कम आता हो। इस कारण छात्रों ने मेहनत करना बंद कर दिया क्योंकि उन्हें भरोसा था कि आखिरकार उन्हें अगली कक्षा में तरक्की मिल जायेगी। 


इसी तरह बच्चों के माता पिता यह जान कर खुश थे कि उनके बच्चों को तरक्की मिलेगी और वे कम से कम फेल नहीं होंगे। लेकिन जब बच्चे 9वीं कक्षा में पहुचते हैं तो उन्हें पाठ्यक्रम का बहुत कम ज्ञान होता है। कुछ तो अपने विषयों का क ख ग भी नहीं जानते। 9वीं कक्षा में पहुंचते ही बच्चों पर कठिन विषयों को बोझ पड़ने लगता है और वे फेल हो जाते हैं। अब फेल नहीं करने की नीति लागू न होने के कारण बच्चे दो बार कोशिश कर पास होने का प्रयास करते हैं। कई छात्र तो स्कूल से निकाले जाने का इंतजार करते हैं क्योंकि वे पढ़ाई जारी नहीं रखना चाहते। 


निजी स्कूलों की खुली लूट कोई नयी बात नहीं है। दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली अभिभावक महासंघ और अन्य बनाम दिल्ली सरकार और अन्य के मामले में 12 अगस्त 2011 को दिये फैसले में जस्टिस अनिलदेव सिंह समिति का गठन किया था। इस समिति को हर एक स्कूल के खातों की जांच कर यह पता लगाने को कहा था कि क्या 6ठें वेतन आयोग की सिफारिशों के बाद गैर सहायता प्राप्त निजी स्कूलों में बढ़ाई गयी फीस न्यायोचित थी। उच्च न्यायालय ने निर्देष दिया था कि अगर फीस में वृद्धि न्यायोचित नहीं हुई तो माता पिता को यह राशि 9 फीसद ब्याज के साथ लौटायी जायेगी।

Jइस समिति ने अब तक संकेत दिया कि 450 स्कूलों में फीस बढ़ाना सही नहीं था और कुल मिलाकर वापसी की रकम 250 करोड़ रु से अधिक बनती है। लेकिन अब तक किसी भी अभिभावक को वापसी की देय राशि नहीं मिली है। इससे पहले 1977 में अभिभावकों ने 5वें वेतन आयोग के आधार पर स्कूलों में बढ़ी फीस को उच्च न्यायालय में चुनौती दी गयी थी और न्यायालय ने अंतरिम आदेश में स्कूलों को 40 प्रतिशत तक फीस बढ़ाने की सशर्त अनुमति दी थी, जिससे दिल्ली के अभिभावकों को 400 करोड़ रु से अधिक की रकम वापस की जानी थी।

यह जस्टिस संतोष समिति के निष्कर्ष की शर्त पर आधारित था कि अगर वृद्धि न्यायोचित नहीं पायी गयी तो ऱाशि वापस की जानी थी, लेकिन शिक्षा निदेशालय और निजी स्कूलों की मिलीभगत के कारण समिति के कामकाज को जानबूझ कर प्रभावित किया गया। इस वजह से अब तक कोई राशि वापस नहीं की गयी।


आप सरकार के इस दावे से कि अगर निजी स्कूलों को सरकारी स्कूलों के बराबर वेतन देने को मजबूर किया जायेगा तो निजी स्कूलों को बंद करना पड़ेगा, इस तरह निजी स्कूलों को समर्थन करने के कारण सरकार को माफ नहीं किया जा सकेगा। इन स्कूलों के अधिकांश शिक्षकों विशेष रूप से युवा शिक्षकों को दयनीय स्थिति में काम करना पड़ता है।


सरकार ने यह पाया है कि शिक्षकों को मिल रहे वास्तविक वेतन दे कर अधिक वेतन की पे स्लिप पर हस्ताक्षर करने को मजबूर किया जाता है। दरअसल यह सत्य है, लेकिन वर्तमान कदम से इन शिक्षकों के हालात में सुधार नहीं आयेगा अपितु आम आदमी पार्टी के ईमानदारी के ढोंग को बल मिलेगा। 


शिक्षा क्षेत्र से जुड़े आप के नेताओं और वालंटियरों ने बताया कि किसी को फेल नहीं करने, कई वर्षों से सीखने की प्रक्रिया की कुल खामियों, शिक्षकों पर पाठ्यक्रम पूरा करने के दबाव के कारण कमजोर वर्ग के बच्चों को वांछित स्तर तक लाने की असमर्थता, और इन सबसे बड़ी कमी यह रही कि एक ही कक्षा में सीखने/लिखने के मूल कौशल में भारी असमानता खराब होती शिक्षा प्रणाली के मुख्य कारण कहे जा सकते हैं।  

चुनौती कार्यक्रम के तहत आप सरकार से शिक्षा प्रणाली में उम्मीद की जाती है। लेकिन जिस तरह कार्यक्रम तैयार किया गया उसके अनुसार एक कक्षा में से तीन कक्षायें बनायी गयीं, इससे सरकारी खजाने से आप के वालंटियरों के नौकरियों का सृजन किया गया। 

इस कार्यक्रम के तहत 6, 7 और 8 कक्षा के छात्रों के उनकी अब तक की सीखने की कुशलता के आधार पर उनके फिर समूह बनाये गये।


इस तरह के फिर समूह बनाने से शिक्षकों को सुविधा होती है क्योंकि उन्हें एक कक्षा में अलग अलग बड़ी विभिन्नता वाले छात्रों से निपटने में आसानी होती है। कुशल छात्रों को भी फायदा होता है क्योंकि शिक्षक उन पर सीधे अधिक ध्यान दे पायेंगे जिनके सीखने के स्तर को अधिक उन्नत किये जाने की आवश्यकता है, इस तरह सीखने की एकत्रित कमी को दूर किया जा सकेगा। 


मगर शेष दो अन्य समूहों से निपटने की कोई योजना नहीं है। अखिरकार यही कहा जा सकता है कि यह सरकारी खजाने के दुरुपयोग से आप के वालंटियरों के लिये रोजगार सृजन करने की फैक्ट्री है।    

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